Ek-Besya-Ki-Dil-Ki-Bat-एक-वश्या-की-आत्म-कथा

एक वश्या की आत्म कथा: 



जिस गली को समाज के ठेकेदार गन्दगी कहते हैं !
वही लोग रात को इन गलियों में ज्यादा पाए जाते हैं !!

जो हम को दिन में देखना भी न करते गंवारा !
ना जाने कितने वैसों की रातों को हमने संवारा !!

दिन में वे करते हमसे घृणा और देते रहे हैं दुत्कार !
रात को वही गोद में बैठा करते बीवी से ज्यादा प्यार !!

बातें करते बड़ी बड़ी ये है इन ठेकेदारों का असूल !
छोड़ते नहीं जब तक हो ना जाए पूरा पैसा वसूल !!
शादी में दिए वचन पर नारी मानूँगा बहन !
हवस की भूख के आगे सब वचन हुए दहन !!

काश ये ठेकेदार हमें दो वक़्त की रोटी दे पाते !
तो आज हम मजबूर होकर इस धंधे में ना आते !!

पैसे से ख़रीद सको तुम सबसे प्यारा खेल हूँ प्यार का !
मेरी देह पर लिखा हुआ सु-स्वागतम रोज़ नए यार का !!

कहते जहाँ हमारे पैर पड़े वो जगह अपवित्र हो जाए !
रात को उन्हीं पैरों के बीच अपनी मर्दानगी दिखाए !!

यह तो अपना अपना धंधा साहब सब है करते !
अप भूख पूरी है करते, हम भूख के किए करते !

यह तो हमारा एहसान है समाज पे और है चमत्कार !
वरना घर घर गली गली मैं आए दिन हो बलात्कार !

आते है आप पूरा करने अपना अपना अधूरा प्यार साहब !
हम तो तन बेच नहीं कर पाते पूरे बच्चों के अधूरे ख्वाब !

क्यूँ पैदा किया हमको इस कलयुग में बोलो ?
क्या पाप किया हमने खुदा कुछ तो बोलो ?

मेरी बातों का बुरा न मानना मेरे खुदा हुज़ूर !
आप ही हमारे अन्नदाता हो फिर आना जरूर !